🌺 श्री परमहंस अमृत वाणी
आध्यात्मिक चेतना का दिव्य प्रकाश
श्री परमहंस अद्वैत मत की यह वाणी आत्मा के परम कल्याण का गूढ़ संदेश देती है। इसमें सतनाम, सतगुरु, प्रेम और आत्मिक शांति के गहरे रहस्य साकार रूप में सामने आते हैं।
🕉️ (1) जीवात्मा को सच्चा आनन्द कहां मिलेगा?इस भौतिक संसार में आत्मा के साथ कोई भी वस्तु स्थायी रूप से नहीं जाती — केवल सतगुरु और उनका दिव्य वचन (सतनाम) ही सच्चे साथी हैं। सतनाम की कमाई ही सच्चा सुख देती है, जो मन को जन्मों की मलिनता से मुक्त करती है।
। दोहा ।
आदि नाम पारस है, मन है मैला लोह।
परसत ही कंचन भया, छूटा बंधन मोह॥
अर्थात् नाम वह पारस है जो मन रूपी लोहे को छूते ही स्वर्ण बना देता है। इसके प्रभाव से मन निर्मल होता है और मोह-माया के बंधन टूटते हैं। सतनाम पर केंद्रित मन में एक अनोखा आनंद स्वतः प्रकट होने लगता है।
🛤️ (2) मृत्यु के बाद साथ कौन जाता है?
मृत्यु के बाद शरीर भी आत्मा का साथ नहीं देता, यहां तक कि शरीर भी साथ नहीं जाता।केवल सतगुरु का दिया हुआ शब्द और उसका सुमिरण ही आत्मा के साथ चलता है — अतः जीवात्मा की यही सच्ची पूंजी है। सभी सांसारिक संबंध शरीर तक सीमित हैं, आत्मा का न कोई जन्मसाथी है, न मरणसाथी — सिवाय सतगुरु और उनका शब्द ही एकमात्र आत्मा का साथ निभाता है।
🧘♂️ (3) मन की चंचलता का समाधानः
मन को वश में करना अत्यंत कठिन है, परंतु जीवित संत सतगुरु की कृपा और साधना पद्धति से यह मन सहज ही वश में हो सकता है। ग्रंथों शास्त्रों की सच्ची समझ भी सतगुरु के वचन उपदेश से ही संभव है। जैसे कोई कार्य बिना कुशल कारीगर के नहीं होता, वैसे ही अनगिनत जन्मों का मैला मन बिना सतगुरु की शरण के वश में नहीं किया जा सकता। उनकी सेवा पूजा से ही यह मैला मन स्थिर और शांत हो पाता है। जैसे हाथी को एक छोटा सा अंकुश वश में कर लेता है वैसे ही गुरुमति से किया गया अभ्यास मन को शुद्ध करता है और इसकी चंचलता को मिटाता है।
🙈 (4) मानव जीवन का लक्ष्यः
मनुष्य, इच्छाओं के वश होकर कई बार अशुभ कर्म करता है और फिर यह उसकी आदत बन जाती है। संतों का कर्तव्य है उसे यह याद दिलाना कि मानव जीवन केवल भोग या सांसारिक इच्छापूर्ति के लिए नहीं, बल्कि आत्म-ज्ञान और मुक्ति पाने के लिए मिला है। आत्मज्ञान और मुक्ति ही जीवात्मा के लिए एक उत्कृष्ठ पदार्थ है अतः यदि आपने कुछ उत्कृष्ट पाने की लालसा की है — तो सत्संग में आकर सतनाम का सुमिरण करें। इस नाम स्मरण से ही जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति संभव है।
💖 (5) प्रेम ही सर्वोच्च साधनाः
एक सच्चे साधक को अपने हृदय में अपने प्रीतम प्रभु के प्रति सच्चा प्रेम जगाना चाहिए। जब भक्त का मन सच्चे प्रेम और नाम की लगन में डूबता है, तब वह सभी सीमाओं को पार कर परम अवस्था को छू लेता है। जहाँ योगी हजारों जन्मों में नहीं पहुँचते, वहाँ एक प्रेमी कुछ क्षणों में पहुँच जाता है। ऐसा प्रेम आत्मा की परम स्थिति में ही अनुभव होता है।
📌 निष्कर्ष
यह श्री परमहंस अमृत वचन एक दिव्य संदर्भ है — जो हर आत्मा को उसकी सच्ची पहचान और ईश्वर से एकत्व की ओर ले जाता है। यह वाणी सतगुरु के चरणों में समर्पण, नाम की कमाई, और प्रेम की साधना का आत्मिक आह्वान है।
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✍️ प्रस्तुति: श्री आनन्द सन्देश संपादक मंडल परिवार,